परछाईं

ये शायद कहती नही कुछ (सफर कैसा है)
ये शायद पूछती नहीं कुछ (मंजिल कहाँ है)
बस ये ख़ामोशी सी चलती है साथ तेरे

जब होती हैं नजरें सबकी तुझपे
जब होती है सबके तू साथ में
जब ये जिंदगी चखती है सोहरत का स्वाद
हाँ छिप जाती है ये कहीं कोने में

हर गम में साथ है तेरे
हर कदम वो साथ है तेरे
हर ग़मगीन रात में जगती है साथ तेरे
हर जख्म समझे ,उम्र भर दूर नहीं होती

तेरी हर बात सुने
तेरे हर गीत सुने
सुनती है हर शिकायत ये ख़ामोशी से
शायद चाहती है वो हर पल साथ तेरा

हाँ पर जानती है
की सूरज का ढलना शायद
ख़त्म कर रहा है जिंदगी मेरी
पर चाहती है की बस
तेरी परछाईं बनूं

written by 

Raanu 

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